विभु कुमार जी की कहानियों में सामाजिक चेतना

 

श्रीमती उर्मिला शुक्ला, सूरज कुमार देवांगन

शासकीय योगानन्दम महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग)

 

सामाजिक चेतना शब्द का संबंध मनोविज्ञान से है। मनोविज्ञान के अनुसार चेतन मानस की प्रमुख विशेषता चेतना है, अर्थात् वस्तुओं, विषयों तथा व्यवहारों का ज्ञान। चेतना की परिभाषा देना कठिन है, पर इसका वर्णन किया जा सकता है। चेतना की प्रमुख विशेषताओं में निरंतर परिवर्तनशीलता अथवा प्रवाह है। इस प्रवाह के साथ-साथ विभिन्न अवस्थाओं में एक अविच्छिन्न एकता और साहचर्य भी है।

 

सामान्यतः सामाजिक चेतना से हम किसी देश अथवा काल विशेष से संबद्ध, मानव समाज में अभिव्यक्त जागृति से समझते है जो प्रतिक्रियात्मक भी हो सकती है। जनजीवन में लक्षित यह जागृति या सामाजिक चेतना तत्कालीन जीवन में पैदा हुए गतिरोध और गतिशीलता से जन्म ले सकती है।

 

विशेष तौर पर यदि देखा जाए तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय परिवेश में बड़ी तेजी के साथ परिवर्तन हुआ और इन परिवर्तनों का प्रभाव देश की सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक जैसे कई क्षेत्रों पर पड़ा। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप देश के सामाजिक परिवेश पर जो प्रभाव पड़ा उसके परिणाम भयावह थे। समाज में मानवीय मूल्यों का ह्रास, पारिवारिक विघटन, स्त्री-पुरूष संबंधों में कलह, कई क्षेत्रों में पूंजीपतियों का वर्चस्व एवं भय, हिंसा, अविश्वास और अनैतिकता जैसी आदि सामाजिक विसंगतियों एवं विद्रूपताएं समाज में बड़ी तेजी से फैल रही थी।

 

कथाकार विभु कुमार खरे जी की चेतना का निर्माैण तत्कालीन परिस्थितियों से ही हुआ है। इसका मूल कारण था कि स्वयं विभु कुमार खरे जी का संबंध इसी परिवेश से था और परिवेश से संबंधित होने के कारण विभु कुमार खरे जी इससे अछूते नहीं रह सके। कथाकार विभु कुमार खरे जी इन सामािजिक विसंगतियों एवं फलस्वरूप होने वाले परिणामों से काफी चिंतित थे। अतः इन सामाजिक विसंगतियों को अपनी रचनाओं के माध्यम से उजागर करते हुए जनता को इसके प्रति जागरूक करने का सफल प्रयास किया। सन् 1970 में विभु कुमार खरे पहला कथा-संग्रह प्रस्तुत हुआ।

 

सन् 1970 ई. में विभु कुमार खरे जी का सही आदमी की तलाश नामक शीर्षक से पहला कथा-संग्रह सामने आया। उसके पश्चात् मेरे साथ यही तो दिक्कत है (1978) एवं माँ तुम कविता नहीं हो (2004) में प्रकाशित हुई। विभु कुमार खरे द्वारा लिखित इन तीनों कथा-संग्रह की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमेकं स्त्री-पुरूष संबंधों,, परिवार और सामज के ध्वस्त मूल्यों, आम आदमी की तकलीफों एवं व्यवस्था की सड़न इत्यादि सजीव रूप से रूपायित किए गए है।

 

वैसे तो विभु कुमार जी की कहानियों में सामाजिक चेतना एवं राजनैतिक भ्रष्टाचार प्रमुख रूप से उभरकर आते है। इस दृष्टि से विभू कुमार खरे जी की कहानियों में सामाजिक चेतना का मूल्यांकन करना आवश्यक है।

 

सही आदमी की तलाश (1970) - सही आदमी की तलाश विभु कुमार खरे जी का प्रथम कहानी संग्रह है। उनके इस कथा संग्रह में अनेकों ऐसी छोटी-छोटी कहानियाँ है जिसमें उन्होेंने आम आदमी की तकलीफों एवं उनकी निम्न होने की प्रवृत्तियों, मध्यमवर्गीय परिवार की समस्याओं,स्त्री-पुरूष संबंधों एवं समाज में नारी की निम्न स्थिति आदि सामाजिक विसंगतियों पर कड़ा व्यंग्य किया है।

 

सही आदमी की तलाश नामक कथा-संग्रह की पत्नी नामक कहानी में विभु कुमार खरे जी ने सोनीला (सानू) के माध्यम से नारी की निम्न स्थिति को दर्शाया है। इस कहानी में सोनीला एक वैश्य है एवं समाज की इस व्यवस्था के प्रति वह काफी क्रोधित भी है, किन्तु फिर भी वह इस सामाजिक व्यवस्था से उबर नहीं पाती है। अपने इस कहानी के माध्यम से विभु कुमार खरे इस ओर संकेत इंगित करते है कि समाज में वैश्यावृत्ति का विरोध करने वाले ही इस व्यवस्था को अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए अभी तक समाज में बनाये हुए है।

 

बच्चे नामक कहानी में विभु कुमार खरे जी ने आर्थिक अव्यस्था के कारण पनपी मानवीय पीड़ा का वर्णन किया है। प्रस्तुत कहानी में दुकालू की पत्नी का देहांत हो चुका है एवं जैसे-तैसे करके वह अपने तथा अपने बच्चों का भरण-पोशण कर रहा है। दुकालू के पास इतने पैसे नहीं है कि वह अपने बच्चों को अच्छी सुविधा मुहैया कराये। दुकालू गरीबी में अपना जीवन व्यतीत करने के लिए विवश है।

 

उक्त कहानी के माध्यम से विभु कुमार खरे यह दर्शाने की कोशिश करते है कि समाज में आर्थिक व्यवस्था का वितरण इस तरह से हुआ है कि अमीर और धनी होते गये एवं गरीब गरीब। अपने इस कहानी में विभु कुमार जी ने आर्थिक असमानता जैसी सामाजिक विकृति का उजागर किया है।

महानगरीय जीवन की समस्याएं भी सामाजिक विसंगतियों को जन्म देती है। आवश्यक एवं यात्रा वृतांत नामक कहानी इसी महानगरीय समस्या को लेकर लिखा गया हैै अपने आवश्यक नामक कहानी में रवि और पिल्ले महानगर में एक ही छत के नीचे निवास करते है किन्तु फिर भी एक-दूसरे से पूरी तरह से अनजान है। वही यात्रा-शवयात्रा कहानी में मि. प्रसाद की मौत हो जाती है। उनका बेटा लाश को ले जाने के लिए ट्रक की व्यवस्था करता है एवं लाश के साथ अपनी फोटो खिचवाते नजर आता है।

अपनी इस कहानी के माध्यम से विभु कुमार जी यह बताना चाहते है कि आज के इंसान की प्रवृत्ति से निम्नतर हो गई है। उन्हें दूसरों के दुःख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है। अपने मनोवृत्ति नामक कहानी में भी एक अध्यापक का संदर्भ लेकर विभु कुमार जी इंसान की निम्नतर होने की प्रवृत्ति को रेखांकित करते है।

मेरे साथ यही तो दिक्कत है (1978) - मेरे साथ यही तो दिक्कत है नामक कहानी संग्रह में भी उन्होंने सामाजिक विसंगतियों एवं विदु्रपताओं को उजागर करने का प्रयास किया है।

उनकी कमोवेश-सबकी नामक कहानी तीन मित्रों की कहानी है जो आधुनिकता के नाम पर शराब को पूरी तरह से आत्मसात कर चुका है एवं पत्नी तथा प्रेमिका के द्वन्द्व में फंसा हुआ है। विभु कुमार की यह कहानी गिरते हुए सांस्कृतिक मूल्यों की ओर संकेत इंगित करता है।

एक बिछा हुआ आदमी नामक कहानी व्यवस्था के सड़े-गले स्वरूप को सामने लाता है। इसमें कथाकार ने एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया है जो परिस्थितिवश अपने आत्मसम्मान को दरकिनार कर व्यवस्थाओं से समझौता करने के लिए मजबूर है।

एक दुःख अलग हटकर नामक कहानी में विभु कुमार जी ने मध्यवर्गीय परिवार की समस्याओं को उजागर किया है। मध्यवर्गीय परिवारों के रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित यह कहानी अत्यंत सशक्त कहानी है।

खिलाफत नामक कहानी अपने शीर्शक में ही उद्देश्य को प्रस्तुत करने में सक्षम है। विभु कुमार की यह कहानी उन समस्त व्यवस्थओं पर व्यंग्य करता है जो अपने से छोटे अथवा कमजोर वर्ग को दबाकर उनका शोषण करता है।

एक लावारिस लाश कहानी श्रीधर की कहानी है। जो युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। उसमें अदम्य आत्मविश्वास एवं उत्साह है। कभी न टूटने वाली जीवन के प्रति आस्था है किन्तु उसके लिए परिस्थितियाँ इतनी अधिक जटिल हो जाती है कि वह गलत रास्ता अपनाने के लिए विवश हो जाता है। अंततः उसकी लाश लावारिस की तरह पड़ी रहती है।

उक्त कहानी के माध्यम से विभु कुमार खरे इस ओर संकेत करते हंै कि बेरोजगारी की समस्या सामाजिक विसंगतियों को जन्म देती है, जिसके परिणाम सदैव गलत ही होते है।

माँ तुम कविता नहीं हो (2004) - माँ तुम कविता नहीं हो विभु कुमार खरे का अंतिम कथा -संग्रह है अपने इस संग्रह में भी विभु कुमार खरे जी ने पहले के दो कथा-संग्रहों की भाँति ही सामाजिक विसंगतियों को उजागर कर उन्हें दूर करने का सफल प्रयास किया है।

एक गंदी गाली अपने नाम एक साथ अनेक सामाजिक विसंगतियों को उजागर करता है। इसमें मुख्य रूप से विभु कुमार खरे जी ने विवाह की तुलना व्यवस्था से कर, सरकारी व्यवस्थाओं के प्रति कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। विभु कुमार जी कहते है - विवाह व्यवस्था की प्रथम सीढ़ी है, जो पहले सीढ़ी पर चढ़ा सूली पर चढ़ा। वे आगे कहते है कि व्यवस्था लोगों के हित के अनुरूप होना चाहिए।

माँ तुम कविता नहीं हो नामक कहानी विभु कुमार खरे जी की अत्यंत सशक्त कहानी है। उक्त कहानी में काॅलेज के अध्यापकों की हीन मनोदशा का वर्णन किया गाय है। विभु कुमार खरे जी अपने इस कहानी के माध्यम से इस ओर संकेत इंगित करना चाहते है कि - आज के इंसान में इंसानियत नाम की कोई चीज शेष नहीं रह गई है। वह इंसानियत की बात तो करता है किन्तु उसमें ऐसा कोई गुण परिलक्षित नहीं होता है। कहानी के अंत में चिता की आग से सिगरेट जलाना बड़ी ही शर्मनाक बात है।

और घर टूट रहा है नामक कहानी स्त्री-पुरूष संबंधों पर आधारित है। कहानी के नायम नायिका प्रेम विवाह करते है किन्तु बाद में धीरे-धीरे उनके संबंधों में तनाव बढ़ने लगता है। घर,घर न रहकर अखाड़ा बन जाता है घर अंततः बिखर जाता है।

अपने इस कहानी के माध्यम से विभु कुमार खरे जी इस ओर संकेत इंगित करते है कि किस तरह मध्यमवर्गीय परिवार में प्रेम-विवाह होते है किन्तु बाद में संस्कारों की टकराहट की स्थिति निर्मित हो जाती है।

निष्कर्ष: यही कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवेश में परिवर्तन के फलस्वरूप तत्संबंधी समस्याओं में परिवर्तन आया है। भारतीय समाज मे अनेक विसंगतियाँ जैसे पारिवारिक विद्यटन, स्त्री-पुरूष संबंधों में तनाव,भय,हिंसा, अनैतिकता, अविश्वास आदि विसंगतियाँ बड़ी तेजी से फैल रही थी। विभु कुमार खरे जी अपनी रचनाओं के माध्यम से इन समस्त विसंगतियोें को उजागर करने का सफल प्रयास किया है।

विभु कुमार खरे की कहानियों में सामाजिक चेतना के स्वरूप स्पष्ट रूप से देखे जा सकते है। उन्होंने अपनी कहानियों में आदमी की तकलीफों, मध्यवर्गीय परिवारों, महानगरीय जीवन की समस्याओं, समाज में नारी की निम्न स्थिति, मानवीय पीड़ा का वर्णन एवं अनैतिकता तथा अविश्वास जैसी अनेक सामाजिक विसंगतियों को उजागर कर जनता को इसके प्रति जागरूक करने में सफल हुए है।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची-

 

1. जैन, विनोद -स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी महिला नाटककारों के नाटकों में सामाजिक चेतना, नई दिल्लीः के.के.पब्लिकेशन्स, प्रथम संस्करण 2007,09

2. शुक्ल, विनोदशंकर-विभु कुमार चयनिका, रायपुर,गं्रथ अकादमी प्रथम संस्करण 2007,09

 

Received on 15.03.2013

Revised on 05.04.2013

Accepted on 09.04.2013

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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(2): April-June, 2014, 244-246