उच्च शिक्षा का सामाजिक विकास पर प्रभाव

 

अभिलाषा शर्मा एवं ज्योति रवि तिवारी

 

गृहविज्ञान संकायए शास. दू.. महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर, (.

 

 

प्रस्तावनारू

शिक्षा किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास की धुरी होती है शिक्षा के बिना कोई भी राष्ट्र समाज या व्यक्ति प्रगति नही कर सकता है शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यकित समाज या देश का मूल्यांकन किया जा सकता है शिक्षा नागरिकों में आत्मविश्वास, आत्मगौरव, आत्मसंतोष जैसे भावों को भरने के साथ-साथ समाज सेवा जैसे सद्गुणों को विकसित करने की अलौकिक शक्ति है

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में उच्च शिक्षा का विकास तीव्रगति से हुआ वर्तमान समय में 207 विश्वविद्यालय तथा 9278 महाविद्यालय में 68 लाख युवा शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं आधुनिक भारत में शिक्षा का उद्देश्य लोकतांत्रिक नागरिकता का विकास करना भी रहा है

 

शिक्षा बहुआयामी होती है जो सामाजिक विकास करती है भारत में उच्च शिक्षा की परंपरा प्राचीन काल से है वैदिक काल में गुरूकुल शिक्षा का केन्द्र था स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् उच्चशिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार हेतु विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की स्थापना की गई (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986) के अनुसार उच्चशिक्षा में न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था तथा उनके ग्रहण क्षमता के अनुरूप प्रवेश निश्चित करने के प्रयास किये गये है राष्ट्रीय शिक्षा नीति में दिये गये वक्तव्य के बाद भी उच्च अध्ययन संस्थाओं के अनियोजित विस्तार को रोका नहीं जा सका है अतः विश्वविद्यलयों की संख्या जो 1985-86 में 149 थी वह 1992-93 में बढ़कर 207 हो गई और इस अवधि में महाविद्यालयों की संख्या 5816 से बढ़कर 6323 हो गई।ं इस समय 9278 महाविद्यालयों में 68 लाख युवा शिक्षा प्राप्त कर रहे है

 

उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य के संबंध में मिरडल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था विश्व विद्यालयों की उपाधियाॅ, सरकारी नौकरी के लिए पासपोर्ट हे शिक्षा-विद्याार्थियों को नौकरी के लिए कि जीवन के लिए तैयार करने के सीमित उद्देष्य से प्रदान की जाती थी।

 

विश्वविद्यालय शिक्षा के उद्देश्य:-

1. उच्च शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य छात्रों में मानव मूल्यों का विकास करना होना चाहिए

2. उच्च शिक्षा का स्वरूप इस प्रकार निश्चित किया जाना चाहिए जिससे वह भावी पीढ़ी को भारतीय लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए सक्षम बना सके

3. स्वतंत्र भारत वर्ष ने अपने राष्ट्रीय लक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता, प्रजातांत्रिक गणराज्य, विश्वबंधुता समानता जैसे महत्वपुर्ण गुणों को निर्धारित किया है

4. उच्च शिक्षा इस प्रकार की हो जो नैतिकता तथा आध्यात्मिकता की ओर ले चले

5. उच्च शिक्षा प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति में देश प्रेम की भावना विकसित करने वाली होनी चाहिए

अध्ययन विधि एवं क्षेत्र का चुनाव -प्रस्तुत शोधपत्र में रायपुर नगर के शिक्षित व्यक्तियों का उद्देश्य दैव निर्दशन एवं अनुसूची पद्धति से चुनाव किया गया जिसमें सभी वर्गो के लोग शामिल है

अध्ययन के लिए कुल 100 शिक्षित उत्तरदाताओं का चुनाव किया गया जिसमें 75 प्रतिशत महिला तथा 25 प्रतिशत पुरूष उत्तरदाता है 62 प्रतिशत उत्तरदाता स्नातकोत्तर है 12 प्रतिशत उत्तरदाता स्नातक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त किये हुए है 16 प्रतिशत उत्तरदाता पी.एच.डी. प्राप्त किए हुए है 10 प्रतिशत उत्तरदाता व्यवसायिक शिक्षा भी ग्रहण किये हुए है

प्रस्तुत शोध पत्र में सामाजिक विकास में उच्च शिक्षा की भूमिका को निम्न बिन्दुओं के अंर्तगत परिलक्षित किया गया है

 

1. सामाजिक विकास में उच्च शिक्षा के परंपरागत पाठ्यक्रमों की उपयोगिता

2. सामाजिक विकास में सामाजिक न्याय एवं राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने में शिक्षा की भूमिका

3. भौतिक लाभ की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन

4. उच्च शिक्षा केवल शिक्षा के विकास के लिए तो नही है

5. हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली राष्ट्रीय समस्याओं तथा आवश्कताओं के अनुरूप भूमिका निभा रही है

निष्कर्ष:-

वर्तमान समय में सामाजिक विकास में उच्च शिक्षित व्यक्तियोें की महत्वपूर्ण भूमिका है शिक्षित उत्तरदाताओं की तुलना में उच्च शिक्षित उत्तरदाताओं में नवीन विधियों को सभी स्तर पर अपनाने की योग्यता एवं उत्तरदायित्व को समझने की क्षमता परिलक्षित होती है

 

डेल के अनुसार - अनेक प्रकार के वैयक्तिक विकास एवं सामाजिक प्रगति की प्राप्ति के लिए उत्तम साधन पढ़ाई के अतिरिक्त ओर कोई नही है प्रकाशित वस्तुओं में अब विस्तृत सूचनाएॅ रहती हेे। अनेक समस्याओं का समाधान मिलता है और अन्य किसी भी उपलब्ध साधन की अपेक्षा यह आनेद और संतोष देने वाला साधन है

 

 

90 प्रतिशत लोगो का मानना है कि सामाजिक विकास में उच्च शिक्षा के परंपरागत पाठ्यक्रमों में समयानुसार परिवर्तन होना चाहिये जो कि उस समय प्रचलित आवश्यकताओ के अनुरूप् होना चाहिये। जबकि 10 प्रतिशत परंपरागत पाठ्यक्रमों पर जोर देते है। सामाजिक न्याय के संदर्भ में 75 प्रतिशत का मानना है कि अगर हम समाज को उन्नत करना चाहते है।उनमे राष्ट्रीयचेतना विकसित करना चाहते हैतो हमे आरक्षण पर बल जातिगत चाहिये बल्कि इसका आधार आय होना चाहिये। क्योकि सरकार भी मान रही है कि शिक्षा हर बच्चे का मूलभूत अधिकार है,अतः आर्थिक रूप से पिछडे लोगो को चाहे वह किसी भी जाति का हो उसे आरक्षण जातिगत होना चाहिये।

 

उच्च शिक्षा के द्वारा व्यक्तियों में नैतिक उत्थान तो होता ही है और चूकि उनको व्यवसाय के भी उच्च अवसर प्राप्त होते है अतः भौतिक लाभ की प्रवृिा को भी प्रोत्साहित करती है और यही कारण है कि आज का युवा वर्ग जहाॅ व्यवसाय के अवसर समुचित होते है वहाॅं जाना पसंद करता है।

उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियो मे गुणात्मक वृद्धि होती है उनके सर्वागीर्ण विकास होता है। 80प्रतिशत व्यकित गुणात्मक वृद्धि पर बल देते है।

100 प्रतिशत व्यक्तियो का मानना है कि उच्च शिक्षा के द्वारा

राष्ट्र का विकास संभव है क्योकि शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिनके द्वारा परिवार का फिर राष्ट्र का फिर समाज का विकास सेभव है।

 

सुझाव: -

1. उच्च शिक्षा में चयनात्मक प्रणाली का प्रयोग किया जाए

2. शिक्षा का संबंध रोजगार से होना आवश्यक है

3. पंरपरागत पाठ्यक्रमों में परिवर्तन वर्तमान आवश्यकताओ के अनुरूप किया जाना चाहिये।

4. नई शिक्षा प्राप्ति के माध्यमों का प्रयोग किया जाए

5. परीक्षा प्रणाली में संशोधन किया जाए

6. रोजगार परामर्श केन्द्रों की स्थापना की जाए

7. व्यवसायिक पाठ्यक्रमों के प्रति विद्यार्थियों में अभिरूचि उत्पन्न की जाए

8. उच्चशिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण व्यवस्था पर पुर्नविचार किया जाए

9. उच्च शिक्षा नीतियों का सही ढ़ंग से क्रियान्वय किया जाए

10. महाविद्यालय में विद्यार्थियों की असंतुलित भीड़ को कम करें

 

संदर्भ सूची:-

1 सामाजिक परिवर्त्रन - यशदेव शल्य राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर

2 भारतीय शिक्षा का विकास एवं समस्याएॅ - प्रो. आर.एन. शुक्ल

3 शिक्षा आयोग की रिपोर्ट 1964-65 षिक्षा और राष्ट्रीय विकास भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय (हिन्दी संस्करण)

4 शिक्षा समस्या और समाधान - मुनि कल्याण सागर

5 समाज दर्शन की भूमिका - डाॅ. जगदीश सहाय श्रीवास्तव

 

Received on 02.11.2010

Accepted on 16.11.2010

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Research J. of Humanities and Social Sciences. 1(3): Oct.-Dec. 2010, 91-92